जालौन के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने के आधार पर उसका चरित्र प्रमाण पत्र (Character Certificate) जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 504 और 506 जैसे मामलों का लंबित होना अपने आप में चरित्र प्रमाण पत्र के आवेदन को खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पड़िया एवं न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने जालौन जिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए पारित किया। मामला उस समय सामने आया था, जब जालौन के जिला मजिस्ट्रेट ने केस क्राइम संख्या 913/2018 में आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत आपराधिक मामला लंबित होने का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता का चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया था।
जिला मजिस्ट्रेट जालौन के इस आदेश को याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में मांग की गई कि आदेश को निरस्त कर चरित्र प्रमाण पत्र के आवेदन पर विधि के अनुसार दोबारा विचार किया जाए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले भी अनिल कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह स्पष्ट कर चुका है कि केवल किसी आपराधिक मुकदमे के लंबित होने के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं किया जा सकता। उस प्रकरण में भी संबंधित अधिकारी का आदेश रद्द करते हुए न्यायालय ने चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि उसने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जानकारी आवेदन में छिपाई नहीं थी। साथ ही यह भी कहा गया कि आवेदन निरस्त किए जाने के बाद संबंधित आपराधिक न्यायालय ने उसे उक्त मामले में बरी भी कर दिया। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए बताया गया कि दोषसिद्धि, बरी होने तथा लंबित आपराधिक मामलों के प्रभाव को लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि केवल आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत मुकदमा लंबित होने के कारण चरित्र प्रमाण पत्र का आवेदन अस्वीकार करना विधिसम्मत नहीं है। न्यायालय ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने किसी तथ्य को छिपाया नहीं था, इसलिए उसके आवेदन को केवल लंबित मुकदमे के आधार पर खारिज करना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट, जालौन द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को निर्धारित प्रारूप में चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया जाए। इसके साथ ही न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर ली।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा, जहां केवल लंबित आपराधिक मुकदमों के आधार पर प्रशासनिक लाभ या चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार किया जाता रहा है।




