Tuesday, September 8, 2026
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69 हजार शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट में फाइनल बहस शुरू, आरक्षण विवाद पर बुधवार को अहम सुनवाई

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उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से अंतिम दौर की सुनवाई शुरू हो गई। जस्टिस एसबीएन भाटी और जस्टिस एनबी अंजारिया की डबल बेंच ने मामले से जुड़े अभ्यर्थियों और पक्षों को आठ अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर सुनवाई शुरू की है। पहले दिन चयनित अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलें रखीं। इसके बाद EWS तथा BEd-BTC/D.El.Ed से जुड़े मामलों पर भी अदालत ने पक्ष सुना। अदालत ने संकेत दिया कि सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद ही 13 अगस्त 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ डबल बेंच द्वारा दिए गए फैसले को लागू करने की रूपरेखा तय की जाएगी। साथ ही यह भी तय होगा कि किस वर्ग के अभ्यर्थियों को पहले राहत दी जाए। मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।

आठ श्रेणियों में बांटकर हो रही अंतिम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 69 हजार शिक्षक भर्ती से जुड़े विवाद को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर अंतिम बहस शुरू की है। इनमें चयनित अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थी, आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थी, EWS वर्ग, एक अंक विवाद से जुड़े अभ्यर्थी, एक्स-सर्विसमैन, BEd-BTC/D.El.Ed से संबंधित अभ्यर्थी, जिला आवंटन की गड़बड़ी से प्रभावित अभ्यर्थी और शिक्षा मित्रों से जुड़े मामले शामिल हैं।

अदालत सभी पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद भर्ती को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट करेगी। माना जा रहा है कि यदि सुनवाई निर्धारित समय के अनुसार पूरी हुई तो इसी महीने इस लंबे समय से लंबित विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ सकता है।

प्रदर्शन करते अभ्यर्थी

चयनित अनारक्षित अभ्यर्थियों ने नौकरी बचाने की रखी दलील

मंगलवार को सबसे पहले उन चयनित अनारक्षित अभ्यर्थियों का पक्ष सुना गया, जिन्होंने हाईकोर्ट की लखनऊ डबल बेंच के 13 अगस्त 2024 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इन अभ्यर्थियों की ओर से तर्क दिया गया कि उनका चयन निर्धारित मेरिट के आधार पर हुआ था और वे पिछले करीब छह वर्षों से सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने किसी गलत तरीके से नौकरी हासिल नहीं की है। यदि अब चयन सूची में बदलाव कर उन्हें सेवा से बाहर किया जाता है तो उनके सामने रोजगार और भविष्य का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। उन्होंने अदालत से उनके लंबे समय से कार्यरत होने तथा चयन प्रक्रिया में उनकी मेरिट को ध्यान में रखते हुए राहत देने की मांग की।

प्रदर्शन की तस्वीरें

EWS को लेकर कोर्ट में स्थिति हुई स्पष्ट

मंगलवार को EWS श्रेणी के अभ्यर्थियों की ओर से भी अपनी दलीलें रखी गईं। इस दौरान सरकार और संबंधित पक्षों की ओर से कहा गया कि 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का मूल विज्ञापन EWS व्यवस्था लागू होने से पहले जारी किया गया था। ऐसे में बाद में लागू हुए EWS प्रावधान को पुरानी भर्ती प्रक्रिया पर लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने इस पहलू पर सुनवाई करते हुए स्थिति को स्पष्ट किया कि बाद में लागू हुए प्रावधानों का प्रभाव इस पुरानी भर्ती पर नहीं डाला जा सकता। इस आधार पर 69 हजार शिक्षक भर्ती में EWS आरक्षण का लाभ दिए जाने का दावा कमजोर पड़ गया है। यानी इस भर्ती में बाद में लागू हुई EWS व्यवस्था को आधार बनाकर नए सिरे से आरक्षण देने का रास्ता नहीं बनता।

BEd-BTC और D.El.Ed अभ्यर्थियों के मामले पर भी बहस

BEd-BTC/D.El.Ed से जुड़े अभ्यर्थियों की ओर से भी मंगलवार को अपना पक्ष अदालत के सामने रखा गया। इस हिस्से में मुख्य सवाल यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त 2023 के उस फैसले का 69 हजार शिक्षक भर्ती पर कितना प्रभाव पड़ेगा, जिसमें प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति में BEd की पात्रता से संबंधित स्थिति स्पष्ट की गई थी।

संबंधित पक्ष की ओर से दलील दी गई कि 69 हजार शिक्षक भर्ती की पूरी प्रक्रिया और उसका विज्ञापन सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले से पहले शुरू हो चुका था। इसलिए बाद में आए फैसले को इस भर्ती पर इस तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए, जिससे पहले से चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी प्रभावित हो।

सुनवाई के दौरान अदालत ने भर्ती विज्ञापन की तारीख को लेकर जानकारी मांगी। जब यह स्पष्ट किया गया कि 69 हजार पदों की भर्ती का विज्ञापन 4 दिसंबर 2018 को जारी हुआ था और यह प्रक्रिया 11 अगस्त 2023 के फैसले से कई वर्ष पहले की है, तो BEd-BTC से जुड़े मामले की स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो गई। संबंधित अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती के समय लागू नियमों और जारी मेरिट के आधार पर उन्हें नियुक्ति का अधिकार है।

सरकार ने 8270 पदों पर नियुक्ति का प्रस्ताव रखा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से करीब 8270 पदों से संबंधित आंकड़ा भी अदालत के सामने रखा गया। सरकार की ओर से बताया गया कि इनमें 3324 OBC पद ऐसे हैं, जिन पर आरक्षण नियमों के अनुसार पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलनी चाहिए थी, लेकिन किसी कारणवश उन्हें नियुक्ति नहीं मिल सकी।

इसके अलावा करीब 4946 पद ऐसे बताए गए, जिन पर अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया के तहत बुलाया गया था, लेकिन उन्होंने नियुक्ति के बाद कार्यभार ग्रहण नहीं किया। सरकार ने शपथ पत्र के माध्यम से अदालत को बताया कि वह इन 8270 पदों पर नियुक्ति देने के लिए तैयार है।

आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थियों की ओर से सरकार के इस प्रस्ताव को विवाद समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया। उनका कहना है कि यदि 3324 पात्र OBC अभ्यर्थियों के साथ 4946 रिक्त पदों को भी शामिल करते हुए कुल 8270 पदों पर नियुक्ति का रास्ता खोल दिया जाए तो लंबे समय से चल रहा विवाद काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है।

बुधवार को आरक्षण नियमों पर होगी अहम बहस

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को आरक्षण के नियमों और 69 हजार भर्ती में उनके अनुपालन को लेकर महत्वपूर्ण बहस होने की संभावना है। चयनित अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 और आरक्षण नियमावली 1994 के प्रावधानों पर दलील रखेंगे।

आरक्षण से वंचित रह गए OBC वर्ग के अभ्यर्थियों का मुख्य आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में दोनों नियमावलियों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि आरक्षण नियमावली के अनुसार यदि आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में चयनित अंतिम अभ्यर्थी के बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त करता है तो उसे आरक्षित कोटे की सीट में नहीं गिना जाना चाहिए। ऐसे अभ्यर्थी का चयन अनारक्षित सीट पर किया जाना चाहिए।

आरक्षण पीड़ित पक्ष का दावा है कि भर्ती की मूल चयन प्रक्रिया में इस व्यवस्था का सही ढंग से पालन नहीं हुआ। इसके कारण आरक्षित वर्ग के बड़ी संख्या में अभ्यर्थी अपने वास्तविक आरक्षण लाभ से वंचित रह गए।

हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2024 को दिया था नए सिरे से चयन का आदेश

आरक्षण विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ डबल बेंच ने 13 अगस्त 2024 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने मूल चयन सूची को खारिज करते हुए नियमों के अनुरूप नए सिरे से चयन सूची तैयार करने का आदेश दिया था।

आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि आरक्षित वर्ग के योग्य अभ्यर्थियों को उनकी मेरिट के अनुसार अनारक्षित श्रेणी में समायोजित नहीं किया गया। उनका दावा है कि करीब 13,007 अभ्यर्थियों की ओवरलैपिंग हुई, जिसके कारण बड़ी संख्या में OBC और SC अभ्यर्थी आरक्षण के वास्तविक लाभ से वंचित रह गए।

हालांकि हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद चयनित अभ्यर्थियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। इसके बाद से इस मामले में अलग-अलग पक्षों की दलीलें और अंतरिम राहत को लेकर सुनवाई चलती रही। अब सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम बहस शुरू कर दी है।

OBC को 27 की जगह 3.86 फीसदी आरक्षण मिलने का दावा

आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थियों की ओर से 69 हजार भर्ती में आरक्षण व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरक्षण पीड़ित पक्ष से जुड़े राजेश चौधरी के मुताबिक OBC वर्ग को नियमों के अनुसार 27 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए था, लेकिन भर्ती में उसे केवल करीब 3.86 फीसदी आरक्षण का लाभ मिला।

इसी तरह उनका दावा है कि SC वर्ग को निर्धारित 21 फीसदी आरक्षण के मुकाबले करीब 16.2 फीसदी आरक्षण ही मिल सका। आरक्षण पीड़ित पक्ष का कहना है कि यदि नियमों के अनुसार मेरिट और आरक्षण का समायोजन किया जाता तो बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को उनका वास्तविक अधिकार मिल सकता था।

मूल चयन सूची को लेकर भी उठे सवाल

आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों का कहना है कि हाईकोर्ट की लखनऊ डबल बेंच ने मूल चयन सूची जारी करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक मूल सूची सार्वजनिक नहीं की गई। उनका आरोप है कि नियुक्ति के समय जारी कटऑफ और बाद में सामने आए आंकड़ों में अंतर है।

21 जुलाई 2026 को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल कर संशोधित सूची तैयार करने की बात कही थी। इसके साथ नया कटऑफ भी सामने आया। संशोधित आंकड़ों में OBC की कटऑफ 2020 में बताई गई 66.73 से घटकर 65.92 बताई गई है, जबकि सामान्य वर्ग की कटऑफ 67.11 से बढ़कर 69.46 बताई गई है। आरक्षण पीड़ित पक्ष ने इन आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाए हैं और अदालत के समक्ष अपनी आपत्तियां रखी हैं।

याची लाभ से विवाद समाप्त करने की मांग

आरक्षण विवाद से जुड़े अभ्यर्थियों का कहना है कि लंबे समय से चल रहे मामले का समाधान व्यावहारिक तरीके से किया जा सकता है। याची अमरेंद्र पटेल के मुताबिक वे वर्ष 2020 से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछड़ा दलित संयुक्त मोर्चा के प्रदेश प्रवक्ता सुशील कश्यप और मीडिया प्रभारी राजेश चौधरी का कहना है कि यदि सरकार याची लाभ देने का प्रस्ताव स्वीकार करती है तो मौजूदा चयनित शिक्षकों को हटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही पूरी चयन सूची को नए सिरे से तैयार करना पड़ेगा।

अमरेंद्र पटेल का कहना है कि यदि सरकार 3324 पात्र अभ्यर्थियों के साथ 4946 रिक्त पदों को जोड़कर कुल 8270 पदों पर नियुक्ति कर देती है तो आरक्षण से प्रभावित अभ्यर्थी भी समाधान के लिए तैयार हैं। उनका तर्क है कि इससे एक तरफ पहले से नौकरी कर रहे शिक्षकों की सेवाएं सुरक्षित रह सकती हैं, वहीं दूसरी ओर आरक्षण से वंचित अभ्यर्थियों को भी राहत मिल सकती है।

2018 में जारी हुआ था 69 हजार पदों का विज्ञापन

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में सहायक शिक्षकों के 69 हजार पदों पर भर्ती के लिए 4 दिसंबर 2018 को विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद 6 जनवरी 2019 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई। परीक्षा में सामान्य वर्ग के लिए 67.11 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिए 66.73 प्रतिशत कटऑफ निर्धारित की गई थी।

12 मई 2020 को परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। करीब 4.09 लाख अभ्यर्थियों में से लगभग 1.46 लाख अभ्यर्थी सफल घोषित किए गए। इसके बाद मेरिट के आधार पर 67,867 पदों पर अभ्यर्थियों का चयन किया गया।

चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर विवाद सामने आया। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि OBC और SC अभ्यर्थियों को उनके निर्धारित आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिला। मामला पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और फिर डबल बेंच तक पहुंचा। 13 अगस्त 2024 को लखनऊ डबल बेंच ने चयन सूची को लेकर अहम आदेश दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

अब करीब छह साल पुराने इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम बहस शुरू हो चुकी है। मंगलवार को विभिन्न श्रेणियों से जुड़े पक्षों की दलीलें सुनी गईं। बुधवार को आरक्षण नियमों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस होगी। सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत यह तय करेगी कि हाईकोर्ट के 13 अगस्त 2024 के फैसले को किस तरह लागू किया जाए और किन अभ्यर्थियों को किस क्रम में राहत दी जाए। ऐसे में 69 हजार शिक्षक भर्ती से जुड़े लाखों अभ्यर्थियों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संभावित फैसले पर टिकी हैं।

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