जालौन की अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) की अदालत ने वर्ष 2004 के चर्चित डकैती और फायरिंग के मामले में दो आरोपियों को दोषी करार देते हुए कठोर कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई है। न्यायालय ने अभियुक्त देवेन्द्र सिंह और रमेश निवासी ग्राम डकोर, थाना डकोर, को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 395 और 397 के तहत दोषसिद्ध पाया।
अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) चन्द्र मोहन चतुर्वेदी की अदालत ने निर्णय सुनाते हुए दोनों अभियुक्तों को धारा 395 के तहत 10-10 वर्ष के कठोर कारावास तथा 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड अदा न करने पर छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। वहीं धारा 397 के तहत दोनों को 7-7 वर्ष के कठोर कारावास एवं 5-5 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया गया। अर्थदंड जमा न करने की स्थिति में चार माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। न्यायालय ने आदेश दिया कि अर्थदंड के व्यतिक्रम को छोड़कर दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी तथा अभियुक्तों द्वारा पूर्व में जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
शासकीय अधिवक्ता महेंद्र विक्रम के अनुसार, 12 दिसंबर 2004 की रात करीब ढाई बजे सात-आठ सशस्त्र बदमाशों ने डकोर निवासी जागेश्वर दयाल के घर में डकैती की वारदात को अंजाम दिया था। बदमाश घर से नकदी, सोने-चांदी के आभूषण, कपड़े और अन्य सामान से भरा बक्सा लेकर भाग रहे थे। विरोध करने और शोर मचाने पर गांव के लोग मौके पर पहुंच गए। इसी दौरान वादी के चचेरे भाई अरविन्द कुमार उर्फ राजू ने एक बदमाश को पकड़ने का प्रयास किया, जिस पर बदमाश ने जान से मारने की नीयत से गोली चला दी। गोली अरविन्द के पैर में लगी और वह गंभीर रूप से घायल हो गया। ग्रामीणों के बढ़ते दबाव के बीच बदमाश मौके से फरार हो गए।
घटना के संबंध में थाना डकोर में अपराध संख्या 180/2004 के तहत धारा 395 एवं 397 आईपीसी में मुकदमा दर्ज किया गया था। विवेचना के बाद पुलिस ने कृपाल सिंह, देवेन्द्र सिंह और रमेश के विरुद्ध आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
विचारण के दौरान अभियुक्त कृपाल सिंह के अनुपस्थित रहने के कारण उसकी पत्रावली वर्ष 2024 में अलग कर दी गई थी, जबकि देवेन्द्र सिंह और रमेश के विरुद्ध सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
न्यायालय ने आदेश दिया कि दोषी देवेन्द्र सिंह का सजायाबी वारंट जारी कर जिला कारागार उरई भेजा जाए तथा निर्णय की प्रति दोनों अभियुक्तों को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए। इस फैसले के साथ दो दशक से अधिक समय पुराने इस चर्चित मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी अध्याय पूरा हो गया।






