Thursday, July 30, 2026
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राहुल गांधी के बयान से छिड़ी नई बहस: पुलिस फायरिंग के आदेश पर सवाल, 1990 अयोध्या गोलीकांड से हो रही तुलना

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा संसद में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान हुई हालिया घटनाक्रम को लेकर दिए गए बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। राहुल गांधी ने सदन में सवाल उठाया कि क्या युवकों पर गोली गृह मंत्री के कहने पर चलाई गई थी। इस बयान के बाद सदन में PMO के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि पुलिस फायरिंग का आदेश किसी मंत्री द्वारा नहीं, बल्कि विधि के अनुसार सक्षम कार्यपालक मजिस्ट्रेट, डीएम या एसडीएम द्वारा दिया जाता है।

PMO के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि राहुल गांधी को प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए। उनके अनुसार, कानून-व्यवस्था की स्थिति में बल प्रयोग और फायरिंग जैसे निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं और इसके लिए अधिकृत मजिस्ट्रेट की भूमिका होती है।

इसी बीच विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस मुद्दे को वर्ष 1990 के अयोध्या गोलीकांड से जोड़ते हुए नई बहस छेड़ दी है। उनका तर्क है कि यदि वर्तमान में यह कहा जा रहा है कि फायरिंग का आदेश केवल मजिस्ट्रेट देता है, तो फिर 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को राजनीतिक रूप से जिम्मेदार ठहराने का आधार क्या था।

राहुल गांधी

गौरतलब है कि अयोध्या गोलीकांड को लेकर भाजपा लंबे समय से समाजवादी पार्टी और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की आलोचना करती रही है। वहीं अब राहुल गांधी के बयान और उस पर भाजपा की प्रतिक्रिया के बाद विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रिया में फायरिंग का आदेश मजिस्ट्रेट के स्तर से होता है, तो राजनीतिक जवाबदेही किस स्तर तक तय की जानी चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का भी है। किसी भी कानून-व्यवस्था की घटना में कानूनी आदेश और राजनीतिक उत्तरदायित्व दो अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। यही कारण है कि इस विषय पर अलग-अलग दल अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं।

फिलहाल, यह बहस राजनीतिक स्तर पर जारी है। इस मामले में अलग-अलग दलों के अपने-अपने तर्क हैं और अंतिम निष्कर्ष पाठकों तथा जनता के विवेक पर निर्भर करता है।

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