उत्तर प्रदेश में हुक्का बार के संचालन और रेस्तरां में हुक्का परोसने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में सार्वजनिक स्थानों पर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र के भीतर भी ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। रेस्तरां, कैफे और होटल में स्मोकिंग जोन बनाने की आड़ में हुक्का परोसने की अनुमति नहीं होगी। कोर्ट ने इस संबंध में दाखिल 80 याचिकाओं को खारिज करते हुए हुक्का बार के संचालन पर प्रतिबंध संबंधी कानूनी प्रावधानों को प्रभावी बनाए रखने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (कोटपा) और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियम, 2008 के तहत हुक्का परोसने की गतिविधि प्रतिबंधित है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खाद्य प्रतिष्ठान का वैध लाइसेंस होने मात्र से किसी संचालक को हुक्का बार चलाने या ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध कराने का अधिकार नहीं मिल जाता।
मामला लखनऊ पुलिस की ओर से बिना लाइसेंस संचालित हुक्का बार के खिलाफ की गई कार्रवाई से जुड़ा है। पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए विभूतिखंड स्थित फैशन टीवी कैफे समेत 80 संचालकों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि वैध खाद्य लाइसेंस वाले रेस्तरां में निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र के भीतर हुक्का उपलब्ध कराने की अनुमति दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पुलिस के हस्तक्षेप पर रोक लगाने की मांग की थी।
संचालकों की दलीलें अदालत ने नहीं मानीं
सुनवाई के दौरान हुक्का बार संचालकों ने दलील दी कि वे रेस्तरां के भीतर हुक्का उपलब्ध कराते हैं और ग्राहक निर्धारित स्मोकिंग एरिया में इसका इस्तेमाल करते हैं। कुछ संचालकों ने इसे सेल्फ सर्विस बताते हुए कहा कि ग्राहक स्वयं हुक्का इस्तेमाल करते हैं, जबकि अन्य ने हुक्का किराये पर देने की बात कही।
खंडपीठ ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि हुक्का तैयार करना, उसमें तंबाकू भरना, अंगारा रखना, ग्राहक तक पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर अंगारा बदलना भी सेवा प्रदान करने के दायरे में आता है। ऐसे में हुक्का ग्राहक को किराये पर देने या उसके स्वयं इस्तेमाल करने से गतिविधि की कानूनी प्रकृति नहीं बदल जाती।
अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को वाहन सौंप देने के बाद उसके इस्तेमाल पर नियंत्रण बनाए रखना संभव नहीं होता। इसी तरह ग्राहक को हुक्का उपलब्ध कराने के बाद उसके इस्तेमाल और उससे जुड़े जोखिमों पर प्रभावी नियंत्रण का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
स्वच्छ हवा का अधिकार सर्वोपरि
कोर्ट ने कहा कि निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध के नियम का सीमित अपवाद है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वहां हुक्का परोसने जैसी सेवाएं शुरू की जा सकती हैं। नियमों में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन के बाद सेवा संबंधी प्रावधानों का दायरा स्पष्ट किया गया है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों को स्वच्छ हवा में सांस लेने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान से जुड़े प्रतिबंधों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। अदालत के मुताबिक, हुक्का बार चलाना और रेस्तरां में हुक्का उपलब्ध कराना संबंधित वैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
लाइसेंस जारी करने का अधिकार नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि खाद्य सुरक्षा विभाग और नगर निकायों के अधिकारी हुक्का बार के संचालन के लिए अलग से लाइसेंस जारी नहीं कर सकते। वहीं, कोटपा के प्रावधानों के तहत पुलिस को तलाशी, जब्ती और दंडात्मक कार्रवाई करने के अधिकार प्राप्त हैं। कोर्ट ने पुलिस की इन शक्तियों को बरकरार रखा है।
खंडपीठ ने सभी 80 याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसले की प्रति अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजने का निर्देश दिया। इस फैसले से प्रदेश में हुक्का बार संचालकों और उन रेस्तरां पर प्रतिबंध लागू करने का रास्ता साफ हुआ है, जहां स्मोकिंग जोन की आड़ में ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध कराया जा रहा था।






