Friday, August 21, 2026

मजिस्ट्रेट की अर्जी खारिज होने से नहीं रुकती FIR, संज्ञेय अपराध की सूचना पर पुलिस को कार्रवाई जरूरी

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सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में एफआईआर दर्ज करने को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए दिए गए आवेदन को खारिज कर दिए जाने मात्र से पुलिस की एफआईआर दर्ज करने की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। यदि पुलिस के सामने दी गई सूचना से प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो कानून के अनुसार पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच करनी होगी। यह जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर नहीं करती।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें धोखाधड़ी के आरोपों से संबंधित एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई थी कि शिकायतकर्ता ने पहले धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिस को मुकदमा दर्ज कर जांच करने का निर्देश देने की मांग की थी, लेकिन उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। इसके बाद पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज किया जाना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

आरोपी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। इसलिए आवेदन पर आदेश देते समय मजिस्ट्रेट ने मामले की वास्तविकता पर विचार किया था। इस आधार पर आरोपी ने दावा किया कि एक बार आवेदन खारिज होने के बाद उसी आरोपों के आधार पर पुलिस को बाद में एफआईआर दर्ज करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट का आदेश किसी मामले के अंतिम गुण-दोष का निर्धारण नहीं करता। यह कार्यवाही मूल रूप से इस सवाल तक सीमित रहती है कि पुलिस को संज्ञेय अपराध की जांच करने के लिए निर्देश दिया जाए अथवा नहीं। इसलिए आवेदन खारिज किए जाने को ऐसा अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर पुलिस की स्वतंत्र वैधानिक जिम्मेदारी समाप्त हो जाए।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 156(3) के तहत आवेदन की अस्वीकृति आरोपी के पक्ष में किसी अंतिम अधिकार का निर्माण नहीं करती। इसमें न तो मुकदमे का ट्रायल होता है और न ही आरोपों की सच्चाई पर अंतिम फैसला दिया जाता है। ऐसे आदेश को अंतिम न्यायिक निर्णय मानकर बाद में एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

धारा 154 का अपना स्वतंत्र महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 154 का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस की एफआईआर दर्ज करने की जिम्मेदारी कानून से आती है। यह जिम्मेदारी इस बात से खत्म नहीं होती कि मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) की अर्जी स्वीकार हुई थी या खारिज।

अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की ओर से दी गई सूचना में संज्ञेय अपराध के घटित होने का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है तो पुलिस को कानून के अनुसार एफआईआर दर्ज करनी होती है। पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के स्तर पर आरोपों की पूरी सत्यता की जांच करने की आवश्यकता नहीं है। आरोप सही हैं या गलत, घटना वास्तव में हुई है या नहीं और उसमें कौन दोषी है, यह जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्य हैं।

पीठ ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ललिता कुमारी फैसले के सिद्धांत को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि यदि संज्ञेय अपराध की जानकारी पुलिस के सामने आती है तो एफआईआर दर्ज करने का दायित्व कानूनी व्यवस्था से पैदा होता है। इसे मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर किसी आवेदन के परिणाम से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

पुराने फैसले का भी दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने महेंद्री एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में वर्ष 2015 में दिए गए अपने पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि उस फैसले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि धारा 156(3) के तहत आवेदन खारिज होने से मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो जाता और न ही इससे बाद में दर्ज की गई एफआईआर में लगाए गए आरोपों की सच्चाई पर कोई निष्कर्ष निकलता है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसे मामले में ‘रेस ज्यूडिकाटा’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। इसका कारण यह है कि धारा 156(3) की कार्यवाही प्रारंभिक प्रकृति की होती है और इसमें किसी पक्ष के अधिकार या दायित्व का अंतिम निर्धारण नहीं होता।

पुलिस की भूमिका पर अदालत की स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सीधा असर उन मामलों पर पड़ सकता है, जहां शिकायतकर्ता पहले पुलिस के पास जाता है और कार्रवाई नहीं होने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करता है। यदि मजिस्ट्रेट उस आवेदन को खारिज कर देता है, तब भी पुलिस के पास उपलब्ध सूचना के आधार पर यदि संज्ञेय अपराध सामने आता है तो वह कानून के तहत एफआईआर दर्ज कर सकती है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एफआईआर दर्ज करने का उद्देश्य किसी व्यक्ति को तत्काल दोषी ठहराना नहीं, बल्कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने के बाद कानून के मुताबिक जांच की प्रक्रिया शुरू करना है। आरोपों की विश्वसनीयता और उनके पीछे मौजूद वास्तविक तथ्यों का परीक्षण जांच एजेंसी द्वारा किया जाता है।

कानूनी विशेषज्ञ की राय

कानूनी जानकारों के मुताबिक, इस फैसले को पुलिस की वैधानिक जिम्मेदारी और मजिस्ट्रेट की निगरानी वाली भूमिका के बीच अंतर स्पष्ट करने वाला निर्णय माना जा सकता है। धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट से पुलिस जांच का आदेश मांगना शिकायतकर्ता के लिए एक वैधानिक रास्ता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि आवेदन खारिज होने के बाद पुलिस अपनी स्वतंत्र कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एफआईआर दर्ज करने के स्तर पर पुलिस को आरोपों की अंतिम सत्यता तय नहीं करनी है। यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया खुलासा होता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई आवश्यक है। बाद की जांच में यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो उसी के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जा सकती है।

अपील खारिज, हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के तत्व सामने आते हैं। ऐसे में आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला।

शीर्ष अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। फैसले से यह संदेश स्पष्ट हुआ कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) के तहत आवेदन खारिज किया जाना अपने आप में पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करने पर कानूनी रोक नहीं बनता। संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस की वैधानिक जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से कायम रहती है।

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